Sunday, March 22, 2015

भागवत् की हिट लिस्ट में रिबैरो ! --राकेश शांतिदूत


आतंकवाद के दौर में पंजाब के डीजीपी रहे जूलियो रिबैरो जिन्हें लोग रिबैरियो के नाम से संबोधित करते आये हैं, का एक लेख 'भागवत द्वारा खोले मोर्चे ने मुझे फिर से हिटलिस्ट पर धकेला' शीर्षक से बुधवार के पंजाब केसरी में पढऩे को मिला। इस लेख की प्राप्ति के स्त्रोत के रूप में शार्ट फार्म में इस्तेमाल किए गये अंग्रेजी शब्दों से ऐसा लगता है कि मूल रूप से यह अंग्रेजी के दैनिक अखबार इंडियन एक्सप्रैस से लिया गया है। लेख के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है कि उसकी सामग्री राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत् के वर्तमान में  प्रसारित हुए वक्तव्यों को केन्द्र में रख कर तय की गई है। नि:सन्देह विचार के प्रकट करने की स्वतंत्रता भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोत्तम एवं सर्वोच्च गुण है और नागरिकों को प्राप्त संवैधानिक अधिकार भी। इस स्वतंत्रता के तहत भागवत् के जिस उद्देश्य प्राप्ति के प्रयास पर रिबैरो ने जो टिप्पणी की है, उनका खुद का उद्देश्य भी कुछ अलग दिखाई नहीं पड़ता। भागवत के जिस उद्देश्य की ओर रिबैरो इशारा करते दिखाई दिए हैं वह संघ के मूल सिद्धांत 'राष्ट्रवाद' के प्रति उनके राष्ट्र जागरण के अभियान से जुड़ा है। इसके विपरीत रिबैरो का उद्देश्य विशुद्ध रूप से ईसाई समुदाय के दायरे में सीमित दिखाई पड़ा है। कहीं न कहीं यह ईसाईयों के सेवा की आड़ में धर्मांतरण के मिशन को सही साबित करने का प्रयास भी कहा जा सकता है। सही मायनों में इस लेख का केन्द्र बिन्दू भागवत् के वक्तव्यों को बनाये जाने के बावजूद इस की विषय वस्तु ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के अभियान से अलग नहीं हो पाई। 
इस लेख में रिबैरो ने पंजाब में आतंकवाद के दौर से लडऩे के लिए उनके खुद के त्याग के रूप में पदावनति स्वीकारने और श्रेय लेने के रूप में पंजाब के हिन्दुओं और विशेषत: आर एस एस के स्वयंसेवकों की शाखा के दौरान हुई शहादतों पर खुद शोक प्रकट करने जाने का उल्लेख किया है। रिबैरो खुद के इस 'त्याग' को तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा पूछे गये सवाल से अनुमोदित करना तो इस लेख में अनिवार्य माने हुए हैं, लेकिन पंजाब में आतंकवाद को जड़ से उखाडऩे का श्रेय देने के मामले में पंजाब की हिन्दू-सिक्ख एकता, तत्कालीन डीजीपी के पी एस गिल और ओपी शर्मा की भूमिका, दिवगंत मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की शहादत और साम्प्रदायिक एकता एवं सद्भाव के विषय में संघ नेतृत्व की भूमिका का उल्लेख करना जरूरी नहीं समझे। खुद के त्याग, बहादुरी और श्रेय के संदर्भ में उल्लेख करते हुए वर्तमान में रिबैरो को यह लगने लगा है कि वह अपने ही देश में अजनबी हो गये हैं। अपनी ओर अपने धर्म की सुरक्षा की चिंता में वह इस कदर जज्बाती दिखाई पड़े हैं कि पंजाब के डीजीपी के रूप में निभाये गये अपने सरकारी दायित्व को वह पंजाब कीजनता पर एहसान साबित करने की कोशिश करते दिखे हैं। बकौल रिबैरो आतंकवाद में जिन लोगों की उन्होंने सुरक्षा की थी, उन बहादुर पंजाबियों को वह अब चूहों की भांति बिलों से बाहर आकर उनकी निंदा करने का दुस्साहस बता रहे हैं। नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद संघ के घर वापिसी कार्यक्रमों और क्रिसमस को गुड गवर्नेंस डे घोषित करने, दिल्ली के चर्चों और ईसाई स्कूलों पर हमलों को वह एक लघु आकारी और शांतिप्रिय समुदाय को लक्ष्य बनाये जाने के रूप में देखते हुए ईसाई मिशनों के भारत में शिक्षा और सेवा में प्रभावशाली योगदान को दर्ज करते हुए धर्मांतरण को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। रिबैरो अपने इस लेख में भारतीय सेना का प्रमुख एक ईसाई के होने के साथ-साथ जलसेना की कमान में इसी समुदाय का आधिपत्य होने की बात करते हुए ईसाई समुदाय के सेना में योगदान का उल्लेख करते हैं। वह भारत में दो प्रतिशत आबादी वाले अपने ईसाई समुदाय की पीड़ा और भय को व्यक्त करते हुए संघ के लक्ष्य को मुसलमानों के विरूद्ध जोड़ते हुए इससे होने वाली प्रतिक्रिया की आशंका से सिहर उठने का एहसास शब्दों में प्रकट करते हैं।
नि:सन्देह रिबैरो की देश भक्ति, बहादुरी और पंजाब की जनता पर उनके 'एहसान' को उसी प्रकार से मान्यता मिलनी ही चाहिए जैसे वर्दी में प्रत्येक सैनिक, सिपाही, अधिकारी या जनरल को उसके दायित्व निर्वाह के लिए मिलती है। इसके बावजूद उन्हें यह आज्ञा नहीं दी जा सकती कि वह राष्ट्रीय योगदान को साम्प्रदायिक योगदान के रूप में परिभाषित करें। ना ही भारत के धर्म सापेक्ष रूप को धर्मनिरपेक्षता के हथियार से किसी विशेष उद्देश्य की गर्ज से ध्वंस करने की आज्ञा दी जा सकती है। ईसाई मिशनों की भारत में सेवा को मान्यता के साथ इतिहास गवाह है कि गुरु गोबिंद सिंह जी की सेनाओं में भाई कन्हैया जी ने मुगल सेनाओं के घायलों को भी युद्ध क्षेत्र में पानी पिलाया था और उनका ईलाज किया था। वर्तमान में भी भारतीय मूल के जैन समुदाय, सिक्ख समाज, वाल्मीक-रविदासिया-कबीरपंथी समाज, सनातन धर्म, आर्य समाज, नामधारी, निरंकारी सम्प्रदाय सहित संघ व अन्य कई संस्थाएं देश के धर्म-सापेक्ष रूप में बिना किसी भेदभाव के शैक्षिक एवं चिकित्सा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मानवता की सेवा की अपनी परंपरा का पालन कर रही है , लेकिन इनका मिशन धर्मांतरण कदापि नहीं रहा है। भारत पाकिस्तान बंटवारे में भी संघ ने हजारों मुस्लिम बंधुओं की सुरक्षा, संभाल, सेवा कर उन्हें सरहद तक सुरक्षित पहुंचाया था। संघ ने हमेशा राष्ट्रवाद को अपना अभियान बनाया है ना कि हिन्दू धर्मांतरण का कोई मिशन चलाया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत के सांस्कृतिक आधार पर भारत को हिन्दू राष्ट्र बताये जाने पर यदि आपत्ति व्यक्त की जा रही है तो फिर सेवा के  एवज में श्रेय और धर्मांतरण को मूल्य रूप में अदा किए जाने की इच्छा भरी साजिश को भारत विरोधी क्यूं नहीं कहा जाना चाहिए। रिबैरो की चिंता किसी विशेष लक्ष्य को निर्धारित करके अर्थपूर्ण रूप में व्यक्त की गई है। वैसे भी सेवा के एवज में श्रेय को मूल्य रूप में प्राप्त करने की रिबैरो की चेष्टा ईसाई मिशनरियों की सेवा की आड़ में उनके वास्तविक उद्देश्य को प्रकट करने वाली ही है फिर भी मदर टेरेसा यदि ऐसी कोई इच्छा रखे तो वह उनके मिशन का हिस्सा हो सकता है। लेकिन रिबैरो वर्दी में भी अपना योगदान एक भारतीय की अपेक्षा ईसाई मिशनों वाली मानसिकता से ही क्यूं डालते रहे, यह बात कई सवाल खड़े कर रही है।
--राकेश शांतिदूत 
संपादक, दैनिक मैट्रो एनकाउंटर

Wednesday, March 11, 2015

संविधान में देश की पहचान 'इंडिया दैट इज़ भारत' फिर भी शर्म हमको मगर नहीं आती--कृष्ण लाल ढल्ल


जब से गणतंत्र दिवस पर केन्द्र सरकार द्वारा संविधान की मूल प्रस्तावना प्रकाशित हुई तब से कुछ राजनीतिक दलों ने एक विवाद खड़ा कर दिया, जो अभी भी जारी है। ये विवाद इस बात को लेकर शुरू किया गया कि इस प्रस्तावना में धर्म निरपेक्ष और समाजवादी शब्द गायब थे। इस मुद्दे को सरकार के ध्यान में लाने पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती थी, लेकिन इस बात को मोदी सरकार के कथित हिंदुत्व वाद रुझान से जोड़कर राजनीतिक माहौल में गर्मी पैदा कर दी गई और यह आभास दिया जा रहा है कि बवाल मचाने वाले नेता ही अल्पसंख्यकों और गरीबों के मसीहा हैं। 
खेदजनक बात ये है कि सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा इस स्पष्टीकरण के बावजूद मूल प्रस्तावना में ये दोनों शब्द नहीं थे और 1976 में आपातकाल के दौरान उस समय की प्रधानमंत्री इंदरा गांधी द्वारा 42वें संशोधन के माध्यम से संविधान मे दर्ज किए गए थे, जिन्हें हटाने की दरकार की कोई मंशा नहीं है, यह दल विवाद जारी रखे हुए हैं। 
यहां यह बात ध्यान योग्य है कि यदि संविधान मे दर्ज होने के बावजूद धर्म निरपेक्ष और समाजवादी' शब्दों की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह लगा है तो इसके लिए दोषी वही दल नेता हैं, जिन्होंने अपने तुच्छ राजनीतिक हितों को साधने के लिए विशिष्ट पंथक समूहों और जातीय वर्गों का वोट बैंक बनाने के लिए दोनों शब्दों का दुरुपयोग किया और विभिन्न वर्गों में ईर्ष्या, दूरी और आरक्षण आदि कि होड़ पैदा कर दी। इतना ही नहीं इन दलों की केन्द्र राज्यों में बनी सरकारों ने भी हास्यप्रद प्रवृत्ति और आर्थिक विषमता को कम करने के कई गम्भीर कारगार प्रयास नहीं किए। अगर ये दल छदम ही सही धर्म निरपेक्ष समाजवादी स्थिति लाने के प्रति ईमानदार हैं तो वोट बैंक की राजनीति को सर्वथा त्यागें और समानता के लिए नबराबरी पिछड़ेपन का आधार सभी नागरिकों के लिए आर्थिकता को बनाएं। 
उपरोक्त बवाल के चलते सहसा संविधान में दर्ज उस शब्द समूह की और जाता है जो हमारी राष्ट्रीय अस्मिता, देश भावना, राष्ट्र की प्राचीनतम तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए शहीदों अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा दायी शब्द मातृ भूमि के लिए चुनौती हैं। मगर उस शब्द को संविधान में खारिज करने का विचार तक कभी उपरोक्त बवाल मचाने वाले दलों को नहीं आया, शर्म तो क्या महसूस करनी है। यह शब्द है संविधान की प्रस्तावना के तुरंत बाद भाग 1 के पहले प्रावधान में दर्ज 'इंडिया दैट इज़ (अर्थात) भारत ।
स्पष्ट है कि संविधान में अपने देश का मूल नाम इंडिया दर्शाया गया है, जिसे भारत भी कहा जा सकता है। नहीं कह सकते कि किन कारणों से संविधान निर्माताओं ने देश के लिए 'इंडिया' शब्द का प्रयोग करना जरूरी समझा, लेकिन अत्यंत खेद शर्म की बात है कि हम इसे अभी भी जारी रखे हुए हैं। अपेक्षा यह है कि धर्म निरपेक्ष समाजवादी शब्दों को लेकर बवाल मचाने वाले दल नेता ही नहीं बल्कि अन्य सभी दलों और केन्द्र सरकार संविधान में संशोधन कर 'इंडिया' शब्द को उसी तरह खारिज करे जिस तरह अंग्रेजों को बाहर निकाला था और भारत शब्द की गौरवमयी संप्रभु-सत्ता को बहाल करें। मैं तो यह भी अपेक्षा करता हूं कि जब भी कभी केन्द्र राज्य सरकारों द्वारा सूचित किए जाने वाले दस्तावेजों में देश का नाम दर्ज करना हो वहां भारत ही दर्ज किया जाए। यह दिखने में छोटा मगर दूरगामी प्रभाव का बड़ा कदम सिद्ध हो सकता है। 
                                                                                                                   

                                                                         कृष्ण लाल ढल्ल
                                                                           वरिष्ठ पत्रकार 

Tuesday, March 10, 2015

निर्भया डाक्यूमेंट्री भारत पर षड़यंत्र--विनायक सूद

किसी ने सच ही कहा है की लड़के अगर कुल को आगे बढ़ाते हैं तो लड़कियां उस कुल की पहचान बनाती हैं। शायद हम यह भूल गए हैं जिसके परिणामस्वरूप नारियों पर अत्याचार बढ़ता जा रहा है। आज पुरे विश्व में नारी सशक्तिकरण की आवाज़ उठ रही है। भारत भी इस समस्या से वंचित नहीं है। आये दिन हम स्त्रियों पर होते प्रहारों के बारे में सुनते हैं। स्त्रियों की सुरक्षा एक गंभीर चिंता का विषेय बन चूका है।
पिछले दिनों ब्रिटेन के क्चक्चष्ट ने नारी सशक्तीकरण का सन्देश पहुंचाने के लिए २०१२ के निर्भया बलात्कार मामले पर एक दस्तावेज़ी चित्रपटानुकूल यानी की डाक्यूमेंट्री फ़िल्म प्रदर्शित की। इस डाक्यूमेंट्री फ़िल्म पर भिन्न भिन्न तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। पीड़ित महिला के माता पिता ने आपत्ति बयां की है जबकि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा इसके विपरीत प्रचार किया जा रहा है। यह डाक्यूमेंट्री फ़िल्म कई क़ानून तोड़ते हुए बनायीं गयी है। भारतीय संसद में भी इस डाक्यूमेंट्री फ़िल्म प्रति गहरी निंदा प्रकट की गई और केंद्रीय सरकार ने इसके प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बावजूद क्चक्चष्ट ने इसका प्रसारण किया और अब ङ्घशह्वह्लह्वड्ढद्ग पर भी उपलब्ध है। इस परिस्थिति में स्वाभाविक था की विश्व भर में लोग इस डाक्यूमेंट्री फ़िल्म को देखेंगे। बहुत सारे लोगों ने इस घिनोनी हरकत की निंदा की और बहुत सारे लोगों के मस्तिष्क में भारत की तस्वीर बदल गयी है। इस में कोई शक नहीं है की बलात्कार एक दंडनीय अपराध है और इसका किसी मायने में बचाव नहीं किया जा सकता परंतु जो सवाल यहाँ उजागर होता है की क्या वाकये में क्चक्चष्ट का मकसद जागरूकता फैलाना था की भारत की छवि मिट्टी पलीत करना? आंकड़ों के अनुसार अमरीका और ब्रिटेन में बलात्कार की संख्या भारत से कहीं ज़्यादा है। ऐसे में अगर क्चक्चष्ट को अगर सिर्फ बलात्कार के प्रति जागरूकता ही फैलानी थी तो ब्रिटेन की ही कोई घटना का चित्रण क्यों नहीं किया गया? यह डाक्यूमेंट्री २०१३ में बनायी गयी थी तो अब २ वर्षों के बाद क्यों प्रसारित की जा रही है? नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट का कहना है की आरोपी मनोज कुमार को ₹४०,००० दिए गए। भारत में बलात्कार पीड़ित की पहचान उनके सग्गे-सम्बधियों की सहमति के बिना सार्वजनिक करना एक अपराध है जो की क्चक्चष्ट ने किया है। पीड़ित महिला की सहेली का कहना है की इस डाक्यूमेंट्री में तथ्यों से छेड़-छाड़ की गयी है। इस डाक्यूमेंट्री की सहनिर्माता अंजलि भूषण ने भी निर्माता लेस्ली उद्विन पर कानून की उलंघ्ना का आरोप लगाया है। उन्होंने बताया है की कैसे लेस्ली उद्विन और क्चक्चष्ट ने जानबूझकर नियमों का पालन नहीं किया। कुल १३ लोगों का साक्षत्कार लिया गया परंतु केवल मनोज कुमार, जो की निर्भया मामले में मुख्य आरोपी है, उसका ही साक्षत्कार दिखाया गया है। अंजलि भूषण ने यह भी बताया है की तिहार जेल के प्रशासन और ग्रह मंत्रालय ने यह शर्ट रखी थी की इस डाक्यूमेंट्री का प्रसारण उनकी रज़ामंदी के बिना नहीं किया जाएगी जिसका पालन लेस्ली उद्विन ने नहीं किया। जिस दिन संसद में इस विवाद पर बवाल चल रहा था उसी दिन लेस्ली उद्विन भारत से ब्रिटैन के लिए रवाना हो गयीं। 
ऐसे में लेस्ली उद्विन और क्चक्चष्ट के मंसूबों पर स्वाल उठना स्वाभाविक है। आश्चर्य की बात यह है की क्चक्चष्ट ने हालही में अपने प्रसिद्ध प्रस्तुतकर्ता जिमी सेविल द्वारा नाबालिगों पर यौनउत्पीड़न पर तेहकीकात संबधी रिपोर्ट पर प्रतिबन्ध लगाया है। इस लिए अब लेस्ली उद्विन और क्चक्चष्ट को अपना रुख साफ़ करने की आवश्यकता है। विदेशों में आज भी कई लोग भारत को सांप-सपेरों का देश मानते हैं और दुर्भाग्य की बात यह है की अब वेसे ही कई लोग भारत को एक "बलात्कारी देश" बुलाने लगे हैं। कल की ही बात है की जर्मनी के एक विश्विद्यालय ने एक भारतीय छात्र को प्रशिक्षण के लिए यह कह कर मना कर दिया कि वह एक बलात्कारी देश का निवासी है। हालांकि भारत में जर्मनी के राजदूत ने उस विश्वविद्यालय की कड़ी निंदा की है मगर फिर भी यह एक चिंता का विषेय है।

महाराष्ट्र सरकार के गौहत्या पर प्रतिबंध क़ानून दूसरे प्रांतो के लिए भी नीव बने --विनायक सूद

जैसा की आप जानते हैं की आदरणीय राष्ट्रपति जी ने सालों से अटके महाराष्ट्र सरकार के गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, इससे पुरे देश में ऐसे क़ानून के लिए नींव बन गयी है। हम सब देशवासियों के लिए एक नवीन किरण का जन्म हुआ है। सबसे पहले तो में महाराष्ट्र सरकार को इस युगांतकारी घटना के लिए आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने कुछ चंद आलोचकों की परवाह न करते हुए यह दृढ़ संकल्प लिया है। गौमाता से करोड़ों देशवासियों की आस्था जुड़ीं हुई हैं और अब समय आ चूका है की ऐसे निर्णायक कदम उठाये जाएँ। चूँकि हमारा देश विभिनताओं से भरा हुआ है तो स्वाभिविक है की कुछ लोगों को गौमांस पर प्रतिबन्ध से आक्रोश पैदा हुआ है। यह अनुच्छेद् उन लोगों के लिए ही समर्पित है। ऐसे क्या कारण हैं की मांस मछली खाना प्रतिष्ठा का प्रतीक बनता जा रहा है? गौमाता की पूजा हिन्दूओं के लिए एक महत्वपुर्ण क्रिया है। गौमाता जीता जागता प्रेरणा का स्रोत है। जन्म से लेके मृत्यु तक गौमाता हम मनुष्यों का जीवन सरल बनाने के लिए कट जाता है। इस अटूट समर्पण के बाद भी अगर हम इन्हें क्रूरता का शिकार बनाते हैं तो इससे ज़्यादा शर्म की बात नहीं हो सकती। 
पिछले कुछ दिनों में बहुत सारे मित्रों के साथ इस विषय पर चर्चा और बहस हुई। इस चर्चा और बहस में से एक निष्कर्ष सामने आया की ऐसा एक भी तर्क संगत कारण नहीं है कि किसी मनुष्य को मांसाहारी होना चाहिए। सबसे आम कारण जो सामने आता है - स्वाद! मुझे भी आपके जितना आचार्य होता है की कुछ तो हमारे ही हिन्दू भाइ-बहन है जिन्हें गौमांस स्वाद लगता है! क्या स्वाद के मारे हम इतने स्वार्थी हो गए हैं की हमें पर्यावरण की चिंता ही नहीं है? कल अगर हमे इंसान का मांस भी स्वाद लगने लगे तो क्या हम इंसानों को भी मारना शुरू कर देंगे? अगर हम सब कुछ केवल स्वाद के लिए ही खाते हैं तो इतनी सारी दवाइयाँ क्यों खाते है जो की कड़वी होती हैं? मैं यह प्रश्न मांसाहारियों को अवश्य पूछना चाहूँगा। दूसरा तथ्य जो सुनने में आता है की यह तो "हमारी मर्ज़ी है की क्या खाएं, क्या न खाएं?"। यह पर्यावरण हम सब का है। किसी एक व्यक्ति के कर्म हम सब पर असर करते हैं। ऐसे में कोई इतना स्वार्थी कैसे हो सकता है? कुछ लोगों ने यह बताया की उनके मांसाहारी होने से धरती पर संतुलन बना हुआ है! यह मात्र अज्ञानता की बात है। उदाहरण के लिए आप एक मुर्गी ले लें। हम रोज़ उसे थोड़ा थोड़ा दाना डाल कर बड़ा करते हैं और फिर उसे मार कर अपना एक दिन का भोजन बना देते हैं। अगर हम उस मुर्गी को सीधा खाने के बजाए उसके खाये हुए दाने को खाते तो एक दिन की बजाए कई दिन तक हमारे भोजन का प्रबंध हो जाता। आपसे ही जानना चाहूँगा, हम भोजन को बचा रहे हैं की व्यर्थ कर रहे हैं? इस लिए एक भी कारण नहीं है की हमें माँसाहारी बनना चाहिए। कुछ लोग इसको सांप्रदायिक नज़र से देख रहे हैं। ऐसा कोई भी मज़हब नहीं है जिसमें गौमांस खाना अनिवार्य है। इस स्थिति में उनके धर्म को कोई चोट नहीं पहुँच रही तो सांप्रदायिक नज़र से देखने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। अधिकतर मुस्लिम देशों में सूअरों का कत्लेआम करने की अनुमति नहीं है तो फिर भारत में गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाने पर बवाल क्यों? अगर धार्मिक दृष्टिकोण को छोड़ कर आर्थिक दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो भी गौहत्या नुकसानदायक है। जीवित गौमाता से मिलने वाली आर्थिक सहायता उनकी मृत्यु से मिलने वाले धन से कहीं ज़्यादा है। गौमाता को मूल्य बना कर ग्रामीण भारत में आर्थिक क्रांति की शुरुआत की जा सकती है। गौमाता से हमें दूध, मूत्र एवं गोबर मिलता है जो की मनुष्यों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इन्ही कारणों को मद्देनज़र रखते हुए हमें इस कानून की प्रशंसा करनी चाहिए और यह भी प्रयत्न करना चाहिए के ऐसा कानून पूरे देश में लागू हो। 
धन्यवाद। जय श्री कृष्णा।

                                                                                    --विनायक सूद

सदियों की सजा न बने मशरत की रिहाई-- राकेश सैन

                                 हमने तारीख के वे दौर भी देखे हैं,
                           जब लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई।
जो देश या समाज अपने इतिहास से नहीं सीखते वे एतिहासिक खमियाजा भुगतने को अभिशप्त होते हैं। मुफ्ती मोहम्मद सैयद के नेतृत्व वाली जम्मू-कश्मीर की सरकार ने आतंकवादी मशरत आलम को रिहा किया है। वह मशरत जिसने घाटी में पत्थरबाजी का अभियान चलाया, जिसमें 120 से अधिक लोग मरे और असंख्य घायल हुए। सेना ने उस पर दस लाख का ईनाम घोषित किया और बड़ी मुश्किल से काबू किया। उसके अपराधों की लंबी शृंखला को देखते हुए उसके खिलाफ भारत के खिलाफ युद्ध छेडऩे जैसा गंभीर मामला दर्ज किया गया। इसकी पूरी आशंका है कि सरकार की यह गलती लगभग वैसी ही है जब 1989 में तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सैयद की ही बेटी डा. रूबीया सैयद की रिहाई के लिए जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के आतंकियों व 1999 में कंधार में अगवा किए गए इंडियन एयरलाइंस के मुसाफिरों की रिहाई के लिए खतरनाक आतंकियों को छोड़ा गया था। इतिहास साक्षी है कि ये गलतियां कितनी महंगी साबित हुईं देश व दुनिया को। आज फिर इतिहास अपने आप को दोहरा दिख रहा है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री श्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की इस तरह की हरकतों को न रोका गया तो भविष्य में इसका बहुत बड़ा खमियाजा भुगतना पड़ेगा हमें।
डा. रूबिया अपहरण मामले में छोड़े गए आतंकी जेकेएलएफ के एरिया कमांडर शेख अब्दुल हमीद, गुलाम नबी भट्ट, नूर मोहम्मद कलवाल, मोहम्मद अलताफ व जावेद अहमद जर्गर तथा कंधार अपहरण कांड में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाईट 814 के यात्रियों के बदले रिहा किए गए मुश्ताक अहमद जर्गर, अहमद उमर सैयद शेख, मौलाना मसूद अजहर जैसे आतंकी केवल हमारे देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए अत्यंत खतरनाक साबित हुए। इन्हीं आतंकियों ने बाद में न केवल डैनिश पत्रकार डैनियल पर्ल का सिर कलम किया बल्कि मुंबई में आतंकी हमले करवाए और पूरी दुनिया में आतंकवाद की आंधी ला दी।
यह दुखद आश्चर्य है कि आतंकी मशरत आलम की रिहाई मुफ्ती मोहम्मद सैयद की उस सरकार ने की है जिसमें आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहनशीलता (जीरो टोलरेंस) की नीति का पालन करने वाली भारतीय जनता पार्टी की बराबर की सांझेदारी है। एक सप्ताह पहले ही अस्तित्व में आई पीडीपी-भाजपा सरकार के नेताओं ने चाहे दावा न्यूनतम सांझा कार्यक्रम के आधार पर चलने का किया है परंतु सरकार के कदमों से एक के बाद एक विवाद छिड़ रहे हैं। राज्य में चुनावी प्रक्रिया की सफलता का श्रेय सीमापार के लोगों व अलगाववादियों को देने वाले मुख्यमंत्री ने बाद में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु के अवशेष मांगने, उसे शहीद का दर्जा देने की बात करके और अब खुंखार आतंकी मशरत को रिहा कर देश को सन्न कर दिया है। देश की एकता-अखण्डता की शपथ लेकर कुर्सी पर विराजमान हुए किसी राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा अपनी संवैधानिक सौगंध के साथ-साथ जिम्मेवारी को इतनी जल्दी भुलाने का उदाहरण पहली बार देखने को मिला है। मुख्यमंत्री श्री सैयद ने कहा है कि राज्य सरकार राजनीतिक बंदियों को रिहा करने की योजना बना रही है परंतु सवाल उठता है कि क्या मशरत जैसा आतंकी राजनीतिक बंदी है ? क्या उसका पत्थरबाजी का अभियान कोई राजनीतिक था ?
देश में इस घटना की तीखी प्रतिक्रिया होना स्वभाविक है और हो भी रही है। अगर विपक्षी दल को छोड़ भी दें तो भी देशवासियों ने भी इस घटना को बड़ी गंभीरता से लिया है। जिस तरह मुंबई का शेयर बाजार आर्थिक गतिविधियों का मापदंड माना जाता है उसी भांति आजकल सोशल मीडिया सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों के प्रति समाज की भावनाओं का दर्पण बन चुका है। इसी के माध्यम से देशवासियों ने इस घटना के प्रति अपनी आपत्ति जाहिर की है। भारतीय जनता पार्टी ने आतंकी मशरफ की रिहाई का विरोध करके ठीक कदम तो उठाया है परंतु उसके लिए केवल निंदा ही पर्याप्त नहीं है। जम्मू-कश्मीर सरकार में उसकी बराबर की भागेदारी है और वहां की सरकार को गलत करने से रोकना विपक्ष की बजाय भाजपा की अधिक जिम्मेवारी बनती है। चाहे आतंकी की रिहाई का मामला पीडीपी का राजनीतिक एजेंडा हो सकता है परंतु सरकार में सत्ता की भागेदारी होने पर भाजपा भी बदनाम के छींटों से बच नहीं पाएगी। इससे भी आगे जाते हुए देश पीडीपी से ज्यादा भाजपा से सवाल करेगा क्योंकि मुफ्ती मोहम्मद की सीमाएं व सोच एक राज्य या वर्ग तक सीमित हो सकती है परंतु भाजपा एक ऐसा राष्ट्रीय दल है जिसकी नींव राष्ट्रवाद पर आधारित है। राज्य के साथ-साथ केंद्र में सत्तारूढ़ होने के कारण उसकी जिम्मेवारी पूरे देश के प्रति बनती है। जम्मू-कश्मीर में पूर्ण बहुमत न होने के कारण पीडीपी का साथ देना भाजपा की राजनीतिक जरूरत हो सकती है परंतु इस आवश्यकता में मजबूरी नहीं झलकनी चाहिए। भाजपा को ‘समर्थन’ और ‘समर्पण’ में अंतर करना होगा और मुख्यमंत्री श्री मुफ्ती मोहम्मद सैयद को बताना होगा कि न्यूनतम सांझा कार्यक्रम में तो इस तरह की बातें शामिल नहीं हैं। कुछ लोग तर्क देते हैं कि पीडीपी जैसी पार्टी के साथ होने पर भाजपा पर लगा कथित अल्पसंख्यक विरोध का लेबल उतर सकता है और अल्पसंख्यक उसकी ओर आकर्षित हो सकते हैं तो ये लोग शुरुआत ही गलती से कर रहे हैं। इस तरह की सोच रखने वाले यह मान कर चल रहे हैं कि देश का अल्पसंख्यक समाज आतंकियों का हमदर्द है। याद रहे कि इस तुष्टिकरण की नीति को जन्म देने और उसका पालन-पोषण करने का अपराध कांग्रेस ने किया था जो इसी कारण से आज देश भर में राजनीतिक हाशिए पर पहुंच चुकी है। अगर श्री सैयद अपनी हरकतों से बाज नहीं आते तो भाजपा को अन्य विकल्प तलाशने चाहिएं और बड़े से बड़े राजनीतिक बलिदान के लिए अपने को तैयार करना चाहिए। भाजपा अगर इन परिस्थितियों में साहसिक कदम उठाती है तो देश में उसकी साख भी बढ़ेगी जनता में विश्वास भी और आतंकवादियों को भी इसका सख्त संदेश जाएगा।

                                                                                                                                                                                              राकेश सैन
                                                              भगत सिंह चौक, नई रेलवे रोड
                                                                                 जालंधर।

Monday, March 9, 2015

भू-अधिग्रहण बिल पर राजनीति या भारत के विरुद्ध षड्यंत्र - रामगोपाल

भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर शुरू हुए तथाकथित किसान आन्दोलन के समानांतर ही आएं स्वयंभू मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनैशनल की, भारत की नई सरकार को निशाना बनाने वाली रिपोर्ट ने यह प्रमाणित कर दिया है कि आम आदमी के नाम पर देश में शुरू हुई राजनीति की जड़ें विदेशी संगठनों से जुड़ी हुई हैं। एमनेस्टी की रिपोर्ट जो कह रही है वही बातें भाषणभाषी दो महीने पूर्व शब्दश: आम आदमी पार्टी के नेता बोल रहे थे। वही भाषा रातों-रात उठ खड़े हुए तथाकथित किसान आंदोलन के मंच से अन्ना हजारे, मेधा पाटेकर और दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल की रही है।
एमनेस्टी की रिपोर्ट पर हाय-तौबा का माहौल बनाना विदेशी कमान वाले भारतीय न्यू•ा टी.वी. चैनलों की मजबूरी या जिम्मेवारी तो हो सकती है लेकिन इस देश के प्रत्येक नागरिक की भी जिम्मेवारी है कि वह तथ्यों की पड़ताल के लिए जड़ तक जाये। भारत की नई केन्द्र सरकार को नरेन्द्र मोदी सरकार कहकर सम्बोधित करना ही इस तथ्य का प्रमाण है कि एमनेस्टी को चिंता भारत के नागरिकों की अपेक्षा देश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने की अधिक है। यह चिंता भी उस समय प्रकट एवं प्रचारित की जा रही है जब मोदी नीत भारत सरकार ने देश हितकारी नई नीतियों के बल पर मात्र नौ महीने में ही महंगाई कम करके इस देश के आम आदमी को शक्ति एवं स्वाभिमान से जीने का अवसर प्रदान किया है और विश्व में भारत का मान बढ़ाया है। अनुशासन के प्रतीक कहे जाते यूरोप-अमेरिका की मिट्टी से जन्मी एमनेस्टी इंटरनेशनल को देश की राजधानी में नागरिकों को अतिक्रमण की छूट देने की अराजकता तो इस देश के लिए खतरनाक दिखाई नहीं देती लेकिन छिटपुट साम्प्रदायिक मतभेद की मामूली घटनाएं उसे धार्मिक हिंसा दिखाई दे रही हैं।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बुधवार को नरेन्द्र मोदी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि मोदी नीत लोकतांत्रिक सरकार के आने से भारत में सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी है और भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से हजारों भारतीयों के जबरन बेदखली का खतरा पैदा हो गया है। रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि अधिकारी लगातार लोगों की निजता और अभिव्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी और भ्रष्टाचार, जाति आधारित भेदभाव व जातिगत हिंसा फैली है। सांप्रदायिक हिंसा का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में भड़की सांप्रदायिक घटनाओं से हिंदू और मुसलिम समुदायों के बीच तनाव बढ़ा। इसके लिए केन्द्रीय नेतृत्व जिम्मेदार है। 
उपरोक्त रिपोर्ट में से मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल (लंदन) का नाम निकाल दिया जाए तो आपको याद आ जायेगा कि पिछले दो महीने से भारत विरोधी इन बातों का भारत में ही प्रचार प्रसार का काम कौन-कौन लोग कर रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है की वर्तमान की केन्द्रीय सरकार के क्रियाकलापों से सारे विश्व में भारत की एक सशक्त राष्ट्र की छवि बननी प्रारम्भ हुई है तथा देश में भी महंगाई पर नियंत्रण के साथ-साथ अनेक प्रशासनिक सुधार भी धीरे-धीरे किये जा रहे हैं। जिसे विश्व में दादागिरि करने वाली शक्तियां पचा नहीं पा रही हैं। इसके लिए उपरोक्त रिपोर्ट ही उनकी मनोव्यथा को प्रकट कर रही है। 
इसलिए दिल्ली चुनाव तथा वर्तमान समय में दिल्ली में चल रहे अन्ना आंदोलन में सारे देश से लोभ-लालच देकर गैर किसानों को इकट्ठा करके उनके सामने यह भाषण दिया जा रहा है कि आज देश में स्थिति अंग्रेजों के जमाने से भी बदतर हो गयी है। उपरोक्त रिपोर्ट इस स्थिति के लिए हवाले के रूप में प्रस्तुत की जा रहा है। इसकी सभी बातों को जोर-जोर से बोला जा रहा है। इनके चेहरे तथा बातों से दिखने वाली नफरत किसके प्रति है। ध्यान रहे सबसे पहले आगरा की एक सामान्य घटना तथा दिल्ली में चुनावों के दौरान चर्च पर प्रायोजित हमले तथा भूमि अधिनियम बिल के संसद में चर्चा के लिए आने से पूर्व ही सारे देश में इसके लिए योजना बनाकर तथा जब संसद चल रही हो तब पूरी दिल्ली को किसान आंदोलन के नाम पर बंधक बनाने का काम करने वाले लोग किसके एजेंडे की पूर्ति कर किसको खुश करने के लिए झूठा प्रचार कर रहे हैं।
ऐसा नहीं कि यह पहली बार हो रहा है। इससे पूर्व की सरकार में उड़ीसा तथा गुजरात के दंगों को आधार बनाकर सरकार को कटघरे में खड़े कर सारे देश में साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा करने का प्रयास किया गया था। आज भी वहीं मेधा पाटेकर से ले करके तीसता शीतलवाड़ समेत सभी वामपंथी जोकि कभी कांग्रेस के पीछे छुपकर वार करते थे आज वह छाती ठोक कर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल हो गए हैं। आज बड़े-बड़े वामपंथी लेखक कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की गुहार लगा रहे हैं इसके पीछे का षड्यंत्र सामने लाया ही जाना चाहिए। ऐसे में एक जागरुक नागरिक होने के नाते हमें देश में घट रही इन सभी घटनाओं पर नजर रखते हुए राष्ट्रहित पुनर्जीवित विश्लेषण करना चाहिए।
भारत को लेकर एमनेस्टी के चरित्र की बात करें तो कुछ वर्ष तक इसकी चिंता भारत के राज्य जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवादियों के हाथों मारे जाने वाले निर्दोष हिन्दू-सिख-मुसलमानों की अपेक्षा पुलिस मुठभेड़ों में मरने वाले आतंकियों के मानवाधिकारों को लेकर अधिक थी। जम्मू-कश्मीर राज्य में हाल ही में आये नये जनादेश की समीक्षा न जाने एमनेस्टी के सरकरदाओं ने करनी जरूरी क्यों नहीं समझी और भूमि अधिग्रहण बिल के लोकसभा में पेश होने मात्र और पर देश के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा संसद में चर्चा से पूर्व ही इसने इसे भारत के तमाम नागरिकों के लिए मोदी सरकार का देश निकाले का आदेश तय कर दिया।
एमनेस्टी को अमेरिका में भारतीय सिखों को ओसामा बिन लादेन कहना और उन पर अत्याचार होने से तो मानवाधिकारों का उल्लंघन दिखाई नहीं देता लेकिन भारत में बांधों, मार्गों, उद्योगों का बनना विकास की अपेक्षा चिंता का विषय दिखाई पड़ रहा है। यह तमाम तथ्य भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए चिंतन का विषय है। यह चिंतन उस समय और भी अनिवार्य है जब देश पटरी पर आ रहा है और दुनिया में इसके गौरव और इसकी शक्ति को स्वीकृति मिल रही है।

वेलन्टाईन-डे और हमारे बच्चे!--डा. शशी कान्ता



इन दिनों हर टी.वी. चैनल की खबरों में हिसार में उस मन्दबुद्धि नेपाली लड़की के साथ बलात्कार और दरिन्दगी के साथ मौत की खबर एक शर्मिदंगी और दुख का कारण बनी हुई है। उसके शरीर के अंगों में पत्थरों का मिलना, राक्षसी रूप का जीता-जागता उदाहरण है। माँ दुर्गां के इस देश में जहां कंजक पूजन किया जाता है, जहाँ कृष्ण खुद बहन द्रोपदी की लाज बचाने आते हैं, जहाँ शिवा जी स्त्रियोंं के साथ अच्छा व्यवहार न करने के कारण अपने सेनापति को देश निकाला दे देते है वहीं सीता जैसी पवित्र माँ की पुत्रियों क्यों हैवानों का शिकार हो रही हैं।
बहुत सारे कारणों में से एक कारण भारतीय समाज में पश्चिम के प्रति बढ़ता आकर्षण है। अंग्रेजी पढ़े लिखे हमारे नौजवान धीरे-धीरे काले अंग्रेज बनते जा रहे हैं। पूरी तरह अंग्रेजी  ना जानते हुए भी अंग्रेजी  बोलकर अपना रोब जमाने का स्वभाव, अंग्रेजो  का नया साल मनाना, अंग्रेजी  तिथि के अनुसार जन्मदिन मनाना (दीपक जलाने की बजाए, दीपक बुझाना) तथा  अंग्रेजी  त्यौहारों को मनाने में मार्डन महसूस करना आज हमारा स्वभाव बन गया है जिसे हर माता पिता खुली आंखों से देख रहा है परन्तु उन्हें रोकने या समझाने की बजाये शांत है। दुर्भाग्यवश हमारा मीडिया और बाजार अपने स्वार्थ के कारण इन त्यौहारों का अंधाधुंध प्रचार प्रसार करते हैं। जिसका असर नौजवान युवक युवतियों पर पड़ता है। 
उदाहरण के लिए एक महीना पहले वेलन्टाईन-डे का प्रचार प्रसार शुरू हो जाता है। सारे बाजार पोस्टरों, गिफ्ट आईटमों से भर जाते हैं। वेलन्टाइन-डे जैसे दिवसों ने ही हमारे देश में हमारी बहनों, बेटियों को एक वस्तु बना दिया। इस दिन लड़के लड़कियां, गुलाब, कार्ड, चाकलेट एक दूसरे को देते हैं और इसे मनाने के लिए होटल के कमरे, रेस्टोरेन्ट, पार्क समुद्र के किनारे बुक करवाते हैं तथा रात-रात तक अपने साथियों के साथ अभद्र नाच करते हैं, शराब का सेवन भी होता है। ऐसी परिस्थिति में किसी का भी व्यवहार सम्मानजनक नहीं हो सकता है और परिणामस्वरूप अभद्र व्यवहार यानि बलात्कार और मौत तक की स्थिति के हम अनेकों उदाहरण अखबारों में अगले दिन पढ़ते हैं। समाज की कुछ नौजवान युवतियों के कारण पूरी स्त्री समाज को शर्मिदा होना पड़ता है। यह पश्चिमी देशों द्वारा हमारी भव्य संस्कृति को खत्म करने तथा अपना व्यापार बढ़ाने का एक तरीका है। वेलनटाइन डे, चाकलेट डे, परपोज डे यह ऐसे दिवस है जो हमारी संस्कृति पर सीधा आघात कर रहे हैं।
मैं अपने नौजवान भाईयों-बहनों को बताना चाहती हूँ कि वें 14 फरवरी का दिन जरूर मनाएं क्योंकि आज जिस आजादी को हम भोग रहे हैं उस आजादी को प्राप्त करने के लिए भारत के तीन नौजवानों ( शहीद भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु) को आज के ही दिन फांसी की सजा सुनाई गई थी। अगर वें फांसी न चढ़ते तो अपना देश भी स्वतन्त्रत नहीं होता। 
आईए! इस दिन हम सब उन्हें हम अपना श्रद्धासुमन अर्पित करें जिन्होंने अपनी जवानी एक जवान की तरह, भारत माँ के चरणों में अर्पित की है। धन्य हे वो माँ जिसने उन्हें जन्म दिया। यही स्त्री जाति की विशेषता है। सीता, सावित्री के इस देश में रहने वाली बेटियों से अनुरोध है वह वस्तु बनकर न जिये। स्वाभिमान का जीवन जिये, रानी लक्ष्मीबाई तथा माता जीजाबाई जैसा जीवन जियें तांकि वे सदियों सदियों तक स्त्री जाति को प्रेरणा देती रहे। 

डा. शशी कान्ता
पठानकोट